धुरकी(गढ़वा)/बेलाल अंसारी
रमज़ान शरीफ का पवित्र महिना चल रहा है। और पूरी दुनिया के मुस्लिम समुदाय के लोग इस पवित्र महिने के एक-एक मिनट को अल्लाह की इबादत मे लगा कर, रोज़ा, नमाज़, सदक़ा, खैरात जैसी वंदना करके अपने रब को राजी करने की कोशिश कर रहे हैं। इस्लाम में रोज़े का मतलब सिर्फ भूखा-प्यासा रहना नहीं है, बल्कि रोज़े का उद्देश्य ये है कि आदमी जब रोज़े से हो तो हर तरह की बुराई से अपने आप को दूर रखे, झूठ, धोखाधड़ी, अत्याचार यदि के बारे में सोचने से भी डरे क्यूँ की अल्लाह को अगर खुश करना है तो जिंदगी को अपनी मनमानी से नहीं बल्कि इस्लाम व क़ुरान के बताये हुए रास्ते पर चल कर गुजारने होंगे।
अगर हम रमज़ान शरीफ मे एक मुस्लमान की ज़िम्मेदारी की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि इस रमज़ान मे हर मुस्लमान के लिए जरूरी है कि वह अपने आस-पास के लोगों को देखे, नज़र दौडाये, कि कोई भूखा तो नहीं है? कोई बीमार तो नहीं है? अपने स्तर से हर ज़रुरत मंद की ज़रूरत पूरी करने की प्रयास करे.
रमजान के महिन में अल्लाह बंदों के लिए रहमतों के दरवाजे खोल देता है, उनकी झोली भर देता है, अल्लाह की रहमत उतरतीं रहती है इस महिने मे, तो हर व्यक्ति की ये जिम्मेदारी है कि वह अल्लाह से अपने जुर्म, गुनाह की माफ़ी मांगे, लौट जाए अल्लाह की बारगाह मे और हाथ जोड़ कर ये दुआ करे कि मेरे मालिक। ग्यारह महीने हम ने बहुत जुर्म किए, बहुत ज़ुल्म किए, शरीअत से हट कर जीवन गुजारा, अपनी तबियत के गुलाम बन गए थे हम, अए हमारे रब आज तक जितनी भी कोताही हुई उन सब से मैं सच्ची तौबा कर्ता हूं तू मेरे जुर्म माफ़ कर दे।
यक़ीनन अगर ऐसी दुआ अगर दिल से किसी ने कर दी तो उस के हाथ नीचे बाद मे आयेंगे माफ़ी का परवाना पहले आजाएगा.
ये महिना अमन, चैन वाला महीना है। अल्लाह हम सभी को अपनी-अपनी मुकम्मल जिम्मेदारी अदा करने की हिम्मत दे.
खुद भी खुश रहें और दूसरों को भी खुश रखें यही है रमज़ान का संदेश. खुद भी खाएं और दूसरों को भी खिलाएं यही है रमज़ान का पैग़ाम.
देखें आप, हम, सब समाज की ज़रूरत बन जाएं, दूसरों के लिए जीना सीखे यही अस्ल जिंदगी है.
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