धुरकी (गढ़वा)/बेलाल अंसारी
स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर लाखों रुपये खर्च कर खरीदी गई ई-रिक्शा अब पंचायत भवन और जनप्रतिनिधियों के दरवाजे पर धूल फांक रही है। गांव का कचरा तो दूर, ये गाड़ियां खुद बेकार पड़ीं हैं और धीरे-धीरे कबाड़ बनने की राह पर हैं।
करीब 2 लाख रुपये कीमत वाली यह ई-रिक्शा धुरकी प्रखंड के कई पंचायतों को एक साल पहले दी गई थी। मकसद था – चौक-चौराहों और सार्वजनिक स्थलों से कचरा उठाकर डंपिंग स्थल तक पहुंचाना। लेकिन न ड्राइवर मिला, न कोई गाइडलाइन। नतीजा, ‘स्वच्छता’ का सपना ई-रिक्शा के पहियों के साथ थम गया।
पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि ग्रामीण खुद खेतों में कचरा डालते हैं, पर किसी और की जमीन पर फेंकने पर विवाद हो जाता है। कचरा भंडारण स्थल तक नहीं बना। सबसे बड़ी दिक्कत – गाड़ी तो दे दी, लेकिन पेट्रोल-ड्राइवर का खर्च कौन देगा, यह किसी ने नहीं बताया।
लाखों रुपये की ये ‘स्वच्छता सवारी’ फिलहाल सिर्फ सरकारी लापरवाही और योजना की नाकामी का प्रतीक बनकर खड़ी है—जैसे खुद कह रही हो, “मुझसे न हो पाएगा!”
Advertisement







Users Today : 8
Total Users : 350920
Views Today : 9
Total views : 504751